विशुद्ध ज्ञानदेहाय त्रिवेदी दिव्य चक्षुषे।
श्रेय: प्राप्ति निमित्ताय नमः सोमार्ध धारिणे।।
.......दुर्गा सप्तशती कीलक अध्याय श्लोक ।।१।।
जिसका शरीर पंचमहाभूतों से परे विशुद्ध (शुद्धतम) ज्ञान से बना है ऋक, यजु: और साम (ज्ञान, कर्म और उपासना) इन तीन प्रकार की ऋचाओं को समेटे हए वेद ही जिसके तीन नेत्र हैं और जिसने अपनी जटाओं में शीतलता देने वाले अर्ध चन्द्र को धारण किया हुआ है परम श्रेय (कल्याण) की प्राप्ति की कामना से उन भगवान शिव को हम बारम्बार नमस्कार करते अर्थात् शिव के शिवत्व के प्रति हम सम्पूर्ण समर्पण पूर्वक नमन करते हैं।
शिव के प्रति समर्पण हमें समस्त पापों से छुटकारा दिलाता है जैसे भगवान कृष्ण भी कहते हैं:-
सर्व धर्मान परित्यज्य मामेकं शरणम व्रज।
अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।
हे मनुष्य तू सब धर्मों कर्मों के बंधनों को छोड़कर सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दे मुझे समर्पित कर दे मैं तेरे सब पापों को नष्ट करके तेरी मुक्ति करा दूँगा। तू इसके लिए व्यर्थ चिंता मत कर।
इसी प्रकार अपने जाने अनजाने सभी कर्म और प्राप्त वस्तुएँ एवं भोग्य पदार्थ सब भगवान शिव के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देने पर (जैसे Income declaration scheme के तहत कहीं से भी किसी भी प्रकार से कमाया गया हो किंतु सरकार उस धन को tax चुका देने पर उसे white money मान लेती है) भगवान शिव हमारे उन सभी कर्मों, प्राप्त भोग्य पदार्थों को अपनी कल्याण कारी शक्तियों से पवित्र कर हम मनुष्यों को और हमारी भावनाओं को भी पवित्र एवं सब पापों से मुक्त कर देते हैं।
क्योंकि
सम्पूर्ण समर्पण के साथ लोक कल्याण की भावना से लोकार्पित किया गया काम ख़ुशहाली लाता है
अपना सब कुछ भगवान शिव को समर्पित कर देने का अर्थ भी यही है कि न केवल धन धर्म और कर्म को बल्कि स्वयं को भी जन कल्याण के प्रति समर्पित कर देना।
जैसे आप कोई व्यापार करते हैं या कम्पनी बनाकर चलाते हैं तो उसमें आपका उद्देश्य यदि तो सिर्फ़ अधिक से अधिक पैसा धन कमाना ही हो जैसा कि आजकल तीन वर्ष तक MBA में सार रूप में यही पढ़ाया जाता है कि कोई भी नई वस्तु (चाहे वो किसी काम की हो या नहीं) पर उसके बारे में जनता को इतना कुछ समझाओ की जनता में उस वस्तु के बाज़ार में आने से पहले ही उसको ख़रीदने के लिए जनता लाइन में लग जाए (generation of demand)
फिर cost cutting के नए नए तरीक़ों की खोज करो जिससे उसका लागत मूल्य (कम्पनियों के हित में) कम हो।
फिर कुल मिलाकर मुख्य उद्देश्य profit making अर्थात कम्पनी को अधिक से अधिक लाभ हो।
यही तो MBA का फ़ंडा। और ये भयंकर पाप है।
और यदि इसी व्यापार को इस ध्येय को ध्यान में रखकर किया जाए जिसके यही सब काम एवं उद्देश्य जनकल्याण की भावना से किए गए हों जैसे:-
जो वस्तु जनसाधारण के लिए आवश्यक हो उसका निर्माण उसके quality से बिना कोई समझौता किए उसकी cost cutting पर काम किया जाए और उस cost cutting का फ़ायदा ग्राहकों को भी मिले जिससे सब जनता का और कम्पनी का भी profit हो और हाँ ये भी ख़याल रखा जाए कि ये कम्पनी उन कर्मचारियों की बदौलत ही आगे उन्नति करती है जो अपने कामों एवं मेहनत व लगन से इसके लिए अपना सर्वस्व छोड़कर इस कम्पनी में काम करने आते हैं तो इसके किसी भी कर्मचारी को कोई कष्ट न हो इसका भी ध्यान रखते हुए उनके हानि लाभ का भी उतना ही ध्यान रखा जाये। तो इस प्रकार आपकी कम्पनी जन कल्याण को समर्पित होगी और पाप के दलदल में भी नहीं फँसेंगे।
आपका भी इससे परम कल्याण होगा।
डॉक्टर प्रमोद कुमार
शिवर्पणमस्तु
कल्याणमस्तु