Saturday, October 20, 2018

सम्पूर्ण समर्पण के साथ लोक कल्याण की भावना से लोकार्पित किया गया काम ख़ुशहाली लाता है

विशुद्ध ज्ञानदेहाय त्रिवेदी दिव्य चक्षुषे।
श्रेय: प्राप्ति निमित्ताय नमः सोमार्ध धारिणे।।
       .......दुर्गा सप्तशती कीलक अध्याय श्लोक ।।१।।

जिसका शरीर पंचमहाभूतों से परे विशुद्ध (शुद्धतम) ज्ञान से बना है ऋक, यजु: और साम (ज्ञान, कर्म और उपासना) इन तीन प्रकार की ऋचाओं को समेटे हए वेद ही जिसके तीन नेत्र हैं और जिसने अपनी जटाओं में शीतलता देने वाले अर्ध चन्द्र को धारण किया हुआ है परम श्रेय (कल्याण) की प्राप्ति की कामना से उन भगवान शिव को हम बारम्बार नमस्कार करते अर्थात् शिव के शिवत्व के प्रति हम सम्पूर्ण समर्पण पूर्वक नमन करते हैं।

शिव के प्रति समर्पण हमें समस्त पापों से छुटकारा दिलाता है जैसे भगवान कृष्ण भी कहते हैं:-

सर्व धर्मान परित्यज्य मामेकं शरणम व्रज।
अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।

हे मनुष्य तू सब धर्मों कर्मों के बंधनों को छोड़कर सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दे मुझे समर्पित कर दे मैं तेरे सब पापों को नष्ट करके तेरी मुक्ति करा दूँगा। तू इसके लिए व्यर्थ चिंता मत कर।

इसी प्रकार अपने जाने अनजाने सभी कर्म और प्राप्त वस्तुएँ एवं भोग्य पदार्थ सब भगवान शिव के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देने पर (जैसे Income declaration scheme के तहत कहीं से भी किसी भी प्रकार से कमाया गया हो किंतु सरकार उस धन को tax चुका देने पर उसे white money मान लेती है) भगवान शिव हमारे उन सभी कर्मों, प्राप्त भोग्य पदार्थों को अपनी कल्याण कारी शक्तियों से पवित्र कर हम मनुष्यों को और हमारी भावनाओं को भी पवित्र एवं सब पापों से मुक्त कर देते हैं।

क्योंकि

सम्पूर्ण समर्पण के साथ लोक कल्याण की भावना से लोकार्पित किया गया काम ख़ुशहाली लाता है


अपना सब कुछ भगवान शिव को समर्पित कर देने का अर्थ भी यही है कि केवल धन धर्म और कर्म को बल्कि स्वयं को भी जन कल्याण के प्रति समर्पित कर देना।

जैसे आप कोई व्यापार करते हैं या कम्पनी बनाकर चलाते हैं तो उसमें आपका उद्देश्य यदि तो सिर्फ़ अधिक से अधिक पैसा धन कमाना ही हो जैसा कि आजकल तीन वर्ष तक MBA में सार रूप में यही पढ़ाया जाता है कि कोई भी नई वस्तु (चाहे वो किसी काम की हो या नहीं) पर उसके बारे में जनता को इतना कुछ समझाओ की जनता में उस वस्तु के बाज़ार में आने से पहले ही उसको ख़रीदने के लिए जनता लाइन में लग जाए (generation of demand)

फिर cost cutting के नए नए तरीक़ों की खोज करो जिससे उसका लागत मूल्य (कम्पनियों के हित में) कम हो।

फिर कुल मिलाकर मुख्य उद्देश्य profit making अर्थात कम्पनी को अधिक से अधिक लाभ हो।
यही तो MBA का फ़ंडा। और ये भयंकर पाप है।
और यदि इसी व्यापार को इस ध्येय को ध्यान में रखकर किया जाए जिसके यही सब काम एवं उद्देश्य जनकल्याण की भावना से किए गए हों जैसे:-

जो वस्तु जनसाधारण के लिए आवश्यक हो उसका निर्माण उसके quality से बिना कोई समझौता किए उसकी cost cutting पर काम किया जाए और उस cost cutting का फ़ायदा ग्राहकों को भी मिले जिससे सब जनता का और कम्पनी का भी profit हो और हाँ ये भी ख़याल रखा जाए कि ये कम्पनी उन कर्मचारियों की बदौलत ही आगे उन्नति करती है जो अपने कामों एवं मेहनत लगन से इसके लिए अपना सर्वस्व छोड़कर इस कम्पनी में काम करने आते हैं तो इसके किसी भी कर्मचारी को कोई कष्ट हो इसका भी ध्यान रखते हुए उनके हानि लाभ का भी उतना ही ध्यान रखा जाये। तो इस प्रकार आपकी कम्पनी जन कल्याण को समर्पित होगी और पाप के दलदल में भी नहीं फँसेंगे।

आपका भी इससे परम कल्याण होगा।

विद्वानों का अनुचर
डॉक्टर प्रमोद कुमार

शिवर्पणमस्तु
कल्याणमस्तु





Friday, October 19, 2018

विजयादशमी पर्व विशेष

2018 के विजयादशमी पर्व पर विशेष:-

एक राम दशरथ घर डोले
          एक राम सीता से बोले।
एक राम का सकल पसारा
         एक राम है जग से न्यारा।।

आइये आपको नवरात्रों और राम जन्म से लेकर पुनः नवरात्रों और फिर रावण पर राम की विजय एवं दशहरे पर रावण का पुतला दहन तक की अभूतपूर्व कथा सुनाते हैं। सावधानी से पढ़ियेगा जीवन नैया असल में पार लग जायेगी।

सीधे इस कथा को प्रारम्भ करने के पहले कुछ शब्दावलियों से आपका परिचय कराते हैं जिसको जानना आपके लिये इस कथा का प्रारूप समझने हेतु बेहद ज़रूरी है, क्योंकि ये आपके लिये यहाँ से आगे बढ़ने के लिये निश्चित रूप से मददगार होगा।

योग एक ऐसी विधा है जिसका नाम सभी ने अवश्य ही सुना होगा। सब ये भी जानते ही हैं कि योग नाम की विधा मनुष्य के जीवन स्तर को ऊपर उठाने हेतु कितनी आवश्यक है। संसार की सभी सभ्यताओं में थोड़े बहुत शब्दान्तर से इसी योग की क्रियाओं को किसी किसी रूप में अपनाया गया है उसको बेशक कोई कुछ भी नाम देता हो।

योग का सम्बंध सिर्फ़ शारीरिक व्यायाम या आसन आदि क्रियाओं मात्र से नहीं है, अपितु चित्त की वृत्तियों को निरुद्ध कर परम सत्य को जानने की क्रिया विधि से है।आसन व्यायाम आदि तो बस शरीर के लिये हैं जो बहुत लाभकारी होते हुए भी योग का मात्र अत्यल्प भाग है जो इसके सभी पहलुओं को स्पर्श भी नहीं करता है।

इस कार्य के लिये समग्र रूप से सिर्फ़ शरीर मन बुद्धि चित्त अहंकार आदि को अलग अलग रूप से लक्ष्य बनाकर सिर्फ़ एक ही लक्ष्य रखा गया है जोचित्त की वृत्तियों का निरोधनाम से कहा गया। जो कुछ भी इस विज्ञान में कहा गया उस सबके पीछे सिर्फ़ एक यही उद्देश्य है और कुछ भी नहीं।

इसके साधन के रूप में योग की क्रियाओं को आठ भागों में कहा गया है। इसीलिए इसे अष्टांग योग भी कहा गया है। इन आठ अंगों में:-
  1. यम:- ये पुन: पाँच है जिनमें अहिंसा,सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आते हैं।
  2. नियम:- ये भी पुन: पाँच ही हैं जो कि शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान के नाम से जाने जाते हैं।
  3. आसन:- आसन का अर्थ यहाँ शीर्षासन हलासन आदि से नहीं हैं बल्कि एक ही आसन में लम्बे समय तक स्थिरता एवं सुख पूर्वक बिना हिले डुले बैठने से है।
  4. प्राणायाम:- श्वास प्रक्रिया अपने नियंत्रण में सुख पूर्वक हो।
  5. प्रत्याहार:- इंद्रियों के विषयों में संयम रखना।
  6. धारणा:- किसी भी कार्य को करने की प्रबल इच्छा शक्ति जागृत करते हुए उसकी सफलता के लिये दृढ़ निश्चय होकर उसमें प्रवृत्त होना।
  7. ध्यान:- अपने अभिलषित कार्यों के मार्ग में सब कुछ छोड़ कर उसी को पूरा करने में अपने ध्यान को केंद्रित करना।
  8. समाधि:- अपने कार्य को अंजाम तक पहुँचा पाना।

अस्तु

इन सभी आठ क्रियाओं को और इनके माध्यम से जब इस मार्ग में प्रवृत्त होने पर जिस तरह से आगे बढ़ना होता है उसको लेकर जब चित्रकार ने चित्र के रूप में इस सब को अंकित/प्रदर्शित किया और क्रिया को मातृत्व का रूप देकर वर्णित करना चाहा तो चित्रकार की कल्पना में अष्टांग योग से आठ भुजाओं से युक्त और उन आठ हाथों में उन आठ क्रियाओं के अनुभाग के रूप में अनेक अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित दिखाया गया।
इन योगांगों के द्वारा किया जाने वाला काम क्या था जो उद्देश्य बताया गया था पहले ही, वो था चित्त कि वृत्तियों का निरोध।
तब इन योगांगों किंवा आठ भुजाओं के माध्यम से मन/प्राण रूपी शेर जो निरंतर स्वच्छंद विचरता है उसको नियंत्रित कर लिया जाना मतलब शेर की सवारी करना।
इसका अर्थ हुआ कि जब कोई मनुष्य योग मार्ग पर चलते हुए उसके आठ अंगों के अनुसरण से जब अपने मन प्राण पर अपना पूरा नियंत्रण पा लेता है तब वो एक प्रकार से दुर्गा स्वरूप ही हो जाता है।

नव रात्रों में इसी दुर्गा के नौ रूपों को नौ दिन में साध लेने पर नवम दिवस साधक स्वयं दुर्गा रूप हो जाता है उस अवस्था के प्राप्त कर लेने पर नवमी तिथि को जिसको कि सिद्धिदात्री के नाम से जाना जाता है साधक का अंतर्मन पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाता है तब वो एक प्रकार से राम का जन्म हुआ जैसा ही समझो या दूसरे शब्दों में कहा जाये तो उसके अंतर्मन में राम प्रकट हो जाते हैं।
वर्ष के प्रथम नवरात्र में तो साधक राम के प्राकट्य तक ही सीमित रहता है, किंतु दूसरे शारदीय नवरात्र में नवमी को राम के प्राकट्य के साथ साथ उसके अंतर्मन से सारे बुरे विचारों के संस्कार समाप्त प्रायः हो जाते हैं तब नवमी के बाद दसवीं तिथि को जीवन से दस तरह के विकारों से मुक्ति मिल जाती है तब उसको राम की रावण पर विजय कहा जाता है। असल में आओ ये भी जान लें कि इसको रावण पर राम की विजय के रूप में क्यों कहा गया है और प्रति वर्ष रावण के पुतले को जलाये जाने का क्या मतलब है कहीं ये एक खानापूर्ति मात्र ही तो नहीं या फिर.....

एक वेद मंत्र है:-
इंद्रं वर्धन्तोsप्तुर: कृन्वन्तो विश्वमार्यम।
अपघ्नन्तो अराव्ण:।।

भाव:- इंद्र कहते हैं स्वर्गाधिपति किंवा देवताओं के राजा को जिसका मतलब होता है समस्त अच्छाइयों के अधिपति प्रतिनिधि।
Spl. Note:- कृपया जैसा इंद्र का चरित्र हनन फ़िल्मों में या कुछ अज्ञानियों द्वारा दर्शाया जाता है उससे इसको कतई co-relate करें। वो इंद्र की ग़लत व्याख्या है। देव शब्द का अर्थ ही होता है जो हमेशा देने को आतुर हों दूसरों का हमेशा भला ही चाहें कभी किसी का बुरा करें। तब देवताओं के राजा इंद्र भी तो इसी स्वभाव को represent करेगा न। लेकिन इंद्र को इन लोगों ने एक विल्लेन के रूप में पेश किया है, जिस चरित्र के रूप में ये अज्ञानी लोग इंद्र को दर्शाते हैं उसमें और राक्षसी प्रवृत्तियों में कोई अंतर ही बहिन रह जाता है।
अस्तु जो कुछ भी हो यहाँ इस मंत्र में तो इंद्र का अर्थ देवत्व से ही है।
तब मंत्र का भावार्थ हुआ कि हम अपने अंदर के इंद्रत्व अर्थात् अच्छाइयों को बढ़ाते हुए विश्व को आर्यत्व मतलब श्रेष्ठ बनाते चलें हम ख़ुद से आर्य/श्रेष्ठ बनेंगे तो हमारा समाज हमारा विश्व ख़ुद से ही श्रेष्ठ बन जायेगा। साथ ही अगली पंक्ति मेंअपघ्नंतो अराव्ण:” मतलब रावणी दसों बुराइयों को समाप्त करते हुए।

इस प्रकार नवरात्रों में अपनी साधना शक्तियों के माध्यम से अपने अंदर की अच्छाइयों को बढ़ाते हुए नवमी तिथि तक राम को अपने हृदय में प्रकट कराकर दशमी तिथि को समस्त बुराइयों रूपी रावण का अंत कर रामत्व की रावणत्व पर विजय के प्रतीक दशहरा या विजयादशमी के रूप में उक्त बुराई के प्रतीक का पुतला सांकेतिक रूप से जलाते हुए दंशहरा उत्सव मनाये तभी उत्सव का आनंद भी है और तभी इसके उद्देश्यों की पूर्ति होगी अन्यथा तो लकीर पीटते रहो और जो मर्ज़ी comment या पोस्ट लिखते रहो कोई लाभ होने वाला नहीं।

लंकाधिपती रावण को मत जलाइये अपने अंदर के रावण को जलाइये इस बार, हर बार, बार बार।
प्रतिवर्ष किए जाने वाले अपने कृत्यों का हिसाब हर छः महीने पर नवरात्रों में clear करते चलिये।

नान्य: पंथा: विद्यतेsयनाय


इसके अलावा और अन्य कोई मार्ग नहीं है।